दृष्ट है अदृष्ट है
तू ही तो इष्ट है
गोधूली, पुरवाई,
कुञ्जों की अंगड़ाई,
जमुना जल की लहरें,
राधा का गीत हुयीं।
द्रोपदी के केश बंधे।
मीरा भी लीन हुयी।
वाह रे कन्हैया
मैं तट की मीन हुयी!
पगडण्डी के रास्ते.......आसमाँ तक
मानस के रंगों में डूबी तूलिका से दृष्ट-अदृष्ट को चित्रित करने का प्रयास : मेरी अंतर्यात्रा...
Sunday, April 26, 2015
मैं तट की मीन हुयी
Thursday, January 2, 2014
लड़की की माँ का पत्र लड़कों के नाम
उसने इनकार किया है,
स्वीकार नहीं..
यह प्रथम-दृष्ट्या भी
उसका संकोच नहीं है
थोडा ध्यान से उसकी आँखों में देखो
सोचो-
फिल्मों में हीरो सरेआम या चुपके से
गाना गाता है, रोकता, टोकता है
क्या फ़िल्म से तुमने यही भाव चुना?
भूल गए हो क्या?
'पंचबाण' भी
देवस्वार्थ से अविवेकी हो
शिवत्व की भेंट चढ़ा है
अरे, राख हो गया, राख!
एक गीत सुनाती हूँ-
"माई जे बेटी के सवाचैं
जइसे घिउ गागर हो
बाबा जे बेटी के निसारैं
जइसे जल माछर हो.."
सामाजिक रीति की गम्भीरता समझे?
आओ,
साहसी बनो
पहले अपना कर्त्तव्य पहचानो
देखो,
तुम्हारे हृदय की सुन्दर भावना को
माता-पिता की बैठक का आतिथ्य
निमन्त्रण दे रहा है
उनकी भावना और बुद्धि के शिष्टाचार में
अपनी परख करो
इस क्रम से
उनके कलेजे के टुकड़े से विश्वास-विनिमय कर
प्रेम की नींव पर
अपने जीवन की इमारत
खडी कर सकते हो
फिर तुम देखोगे कि
दो जोड़ी माता-पिता
कैसे मिल कर तुम एक जोड़ी का जीवन संवारेंगे
अपने सुख को सुख से निहारेंगे,
सुख से निहारेंगे
________________________
18/12/2013 07:00 AM
Sunday, July 29, 2012
हो कभी ना मन विकल..!!
जब आज है सुंदर सृजन,
मन घूमता है क्यों विकल?
तम को ह्रदय में बांध जड़,
लखता नहीं क्यों ज्योति पल?
पलकों तले संसार रच
ढल गए दो-चार पल,
आँखें ठगी-सी रह गयीं
देख विधि का कलित छल।
एक मीठी रागिनी में
सुर उठे जब दूर से,
बंध गए विश्वास सारे
सरगमों में गूंज के।
गुनगुनी सी धूप सिमटी
सांझ ने करवट बदल ली,
कालिमा दर पर्त पसरी
नींद आँखों में कसकती।
राह में हैं शूल चुभते
फूटते हैं पग के छाले,
रिस भी जाती है बिवाई
आह सी मिलती कमाई।
टिमटिमा कर रात रोती
पंखुरी भरती है साखी,
पूछ लो धरती-गगन से
राह वह चलती ही जाती।
चक्र वर्तुल काल का है
भूत से भवितव्य तक,
रख धनात्मक भाव, री सखि!
हो कभी ना मन विकल..!!
मन घूमता है क्यों विकल?
तम को ह्रदय में बांध जड़,
लखता नहीं क्यों ज्योति पल?
पलकों तले संसार रच
ढल गए दो-चार पल,
आँखें ठगी-सी रह गयीं
देख विधि का कलित छल।
एक मीठी रागिनी में
सुर उठे जब दूर से,
बंध गए विश्वास सारे
सरगमों में गूंज के।
गुनगुनी सी धूप सिमटी
सांझ ने करवट बदल ली,
कालिमा दर पर्त पसरी
नींद आँखों में कसकती।
राह में हैं शूल चुभते
फूटते हैं पग के छाले,
रिस भी जाती है बिवाई
आह सी मिलती कमाई।
टिमटिमा कर रात रोती
पंखुरी भरती है साखी,
पूछ लो धरती-गगन से
राह वह चलती ही जाती।
चक्र वर्तुल काल का है
भूत से भवितव्य तक,
रख धनात्मक भाव, री सखि!
हो कभी ना मन विकल..!!
Saturday, June 23, 2012
लौट आ, ओ प्रात!
लौट आ, ओ प्रात!
बुझ रही है लौ दिये की ताक पर।
कृष्ण-पक्ष की रात दोहरी हो रही,
चाँदनी किस ओर जाने छिप गयी!
क्षीण होती लौ दिये की कांपती,
सज रही अर्थी मधुरमय साध की।
झर रहा है फूल हरसिंगार का,
कर रहा है मन तनिक श्रृंगार-सा!
राह से गुजरा पथिक यह सोचता-
"आह! यह सुरभित कहाँ डोला चला?"
लौट आ, ओ प्रात! आँखें खोल दे,
राह डग भरता पथिक यह जान ले,
है उसी की कामिनी सोयी चिता पर।
बुझ रही है लौ दिये की ताक पर...
बुझ रही है लौ दिये की ताक पर।
कृष्ण-पक्ष की रात दोहरी हो रही,
चाँदनी किस ओर जाने छिप गयी!
क्षीण होती लौ दिये की कांपती,
सज रही अर्थी मधुरमय साध की।
झर रहा है फूल हरसिंगार का,
कर रहा है मन तनिक श्रृंगार-सा!
राह से गुजरा पथिक यह सोचता-
"आह! यह सुरभित कहाँ डोला चला?"
लौट आ, ओ प्रात! आँखें खोल दे,
राह डग भरता पथिक यह जान ले,
है उसी की कामिनी सोयी चिता पर।
बुझ रही है लौ दिये की ताक पर...
Saturday, December 6, 2008
खेल से खिलवाड़
50-50 की जगह रास आने लगा है 20-20
20 से पहले 4(420) न लगने देना
पड़ा हुआ है बूढाभी निढाल हस्पताल में दिल के दौरे से
खेल-तमाशे में भरी दुनिया को रोने मत देना।
खेलना--जी-जान से खेलना
क्रिकेट को हॉकी-कबड्डी की गति मत देना।
यह भात्रत है-- विश्व-बंधुत्व की बात करता है,
ख़ुद की कीमत पर दूसरे को गले लगाता है,
शान्ति-प्रिय है-- दूसरा गाल भी आगे करता है,
और भी-- द्रौपदी को हार कर धर्मराज कहलाता है;
चट्टानी संस्कृति है, पिघलने मत देना।
20 से पहले 4(420) न लगने देना
पड़ा हुआ है बूढाभी निढाल हस्पताल में दिल के दौरे से
खेल-तमाशे में भरी दुनिया को रोने मत देना।
खेलना--जी-जान से खेलना
क्रिकेट को हॉकी-कबड्डी की गति मत देना।
यह भात्रत है-- विश्व-बंधुत्व की बात करता है,
ख़ुद की कीमत पर दूसरे को गले लगाता है,
शान्ति-प्रिय है-- दूसरा गाल भी आगे करता है,
और भी-- द्रौपदी को हार कर धर्मराज कहलाता है;
चट्टानी संस्कृति है, पिघलने मत देना।
Friday, September 26, 2008
संबंधों को कैसे बाँध सकूँगी?
कच्ची औ' छोटी सी
जीवन की डोरी से,
जन-जन में विघटित
संबंधों को कैसे
बाँध सकूँगी?
स्पंदन औ' आवाजें
नाड़ी औ' जिह्वा तक
आ-आ कर
थक-थक सी जाती हैं,
डूबती सी साँसे हैं,
अविच्छिन्न रजनी,
मेघाच्छादित दिन है,
दूर छिपा बैठा है
अन्तर्यामी भी,
चिंताकुल, स्याह पड़ी,
पथराई आंखों से
अन्तस्स्थल में अंकित
आस्थाओं को कैसे
आँक सकूँगी?
संबंधों को कैसे
बाँध सकूँगी?
जीवन की डोरी से,
जन-जन में विघटित
संबंधों को कैसे
बाँध सकूँगी?
स्पंदन औ' आवाजें
नाड़ी औ' जिह्वा तक
आ-आ कर
थक-थक सी जाती हैं,
डूबती सी साँसे हैं,
अविच्छिन्न रजनी,
मेघाच्छादित दिन है,
दूर छिपा बैठा है
अन्तर्यामी भी,
चिंताकुल, स्याह पड़ी,
पथराई आंखों से
अन्तस्स्थल में अंकित
आस्थाओं को कैसे
आँक सकूँगी?
संबंधों को कैसे
बाँध सकूँगी?
ले किसका नाम?
रेती में धूप ढले
सिन्दूर में शाम
सागर में रात ढले
ले किसका नाम?
छिटकी-सी खपरैलें
बिखरे-से फूस,
गाँव की मडैया में
सिमटी-सी भू,
खूँटे में चौपाये
सूखी-सी नाँद,
पनिहारिन राह तके
ले किसका नाम?
पिछवाड़े फूल झरे
आँगन में धूल,
द्वारे पर उग आए
कांटे, बबूल।
दीवट पर आस धरे
सांकल पे धाम
देहरी दो नैन जले
ले किसका नाम?
बतियाते मौन रहे
बीते हर जून,
बाबा के हुक्के में
शेष नहीं धूम।
चूल्हे बिन अंगारे
घूरों पे राख,
धनिया गुहार करे
ले किसका नाम?
सिन्दूर में शाम
सागर में रात ढले
ले किसका नाम?
छिटकी-सी खपरैलें
बिखरे-से फूस,
गाँव की मडैया में
सिमटी-सी भू,
खूँटे में चौपाये
सूखी-सी नाँद,
पनिहारिन राह तके
ले किसका नाम?
पिछवाड़े फूल झरे
आँगन में धूल,
द्वारे पर उग आए
कांटे, बबूल।
दीवट पर आस धरे
सांकल पे धाम
देहरी दो नैन जले
ले किसका नाम?
बतियाते मौन रहे
बीते हर जून,
बाबा के हुक्के में
शेष नहीं धूम।
चूल्हे बिन अंगारे
घूरों पे राख,
धनिया गुहार करे
ले किसका नाम?
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