ग़म ग़लत करने को निकले हुए घर से बेघर
खुले शहर में ज़ंजीरे-पा को क्या कहिये।
चमन को नाज़ है जिनकी तनी हुई शै पर
उन दरख्तों की झुकी-सी अदा को क्या कहिये।
खुशी को तौल तराजू पे बेचते हैं ज़हर
भरे बाज़ार की रंगीनियों को क्या कहिये।
लगा के आग चमनज़ारों में आब देते हैं
खुदा के नूर की दस्तूर-ए-दवा क्या कहिये।
ज़ुबाँपे हौंसले, नज़रों में परिदों-सी उड़न
वक़्त की आड़ में बहती हवा को क्या कहिये।