निगाहें ढूँढती हैं क्या
कहाँ पर, कैसे समझूँ मैं?
बियाबाँ-सी हुई बस्ती में
किसको अपना समझूँ मैं?
किया तामीर जिसको भी
वही हर हाल पे बिखरा,
बता तकदीर तू मेरी
तुझे कैसे संवारूँ मैं?
गिरे गेसू, घिरे बादल
आंसू की हुई वर्षा,
छिपा रवि रात के पीछे
किरण कैसे सजाऊँ मैं?
चमन के ज़र्रे-ज़र्रे में
हुआ गुंजार भौंरों का,
कहीं रोई कली कोई
रुदन कैसे सुनाऊं मैं?
अचल के बीच से कटकर
गिरा एक खंड पत्थर का,
कराहेगा वहाँ कोई
ये कैसे जान पाऊं मैं?
निगाहें ढूँढती हैं क्या
कहाँ पर, कैसे समझूँ मैं?
बियाबाँ-सी हुई बस्ती में
किसको अपना समझूँ मैं?
कहाँ पर, कैसे समझूँ मैं?
बियाबाँ-सी हुई बस्ती में
किसको अपना समझूँ मैं?