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Saturday, September 20, 2008

ज़िन्दगी का सफर...

ज़िन्दगी का सफर ख़त्म होने लगा
अब हमारे सपन में थकन आ गई,
मैंने चाहा अभी और जीना मगर
मेरी साँसों में ग़म की घुटन आ गई।

रात बढ़ने लगी, चाँद घटने लगा
चलते-चलते बहारों को नींद आ गई,
मैं जगी रात भर देखती ही रही
कैसे बुझती गई चाँद की चाँदनी।

रह गए अर्ध-निर्लिप्त मेरे नयन
स्वप्न ने थाम बाहें मेरी छोड़ दीं,
हो गयीं बावरी श्याम पलकें मेरी
ज़िन्दगी मेरी बन कर धुंआ उड़ चली।

तन तपन में झुलसता रहा उम्र भर
अश्रु की बूँद से अब फफोले पड़े,
घाव बढ़ता गया, दर्द बढ़ता गया
मैं सिसकती रही, उम्र घटती रही।

याद लेकर ही जी लूँ कोई उम्र भर
हर कथा बन गई पर व्यथा शाम की,
भूलने को तपिश मैंने पी ही ली मै
वो कसक बन हलक में उतरती रही।