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Saturday, June 23, 2012

लौट आ, ओ प्रात!

लौट आ, ओ प्रात!
बुझ रही है लौ दिये की ताक पर।


कृष्ण-पक्ष की रात दोहरी हो रही,
चाँदनी किस ओर  जाने छिप गयी!
क्षीण होती लौ दिये  की कांपती,
सज रही अर्थी मधुरमय साध की।


झर रहा है फूल हरसिंगार का,
कर रहा है मन तनिक श्रृंगार-सा!
राह से गुजरा पथिक यह सोचता-
"आह! यह सुरभित कहाँ डोला चला?"


लौट आ, ओ प्रात! आँखें खोल दे,
राह डग भरता पथिक यह जान ले,
है उसी की कामिनी सोयी चिता पर।
बुझ रही है लौ दिये  की ताक  पर...

17 comments:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  2. ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया....!!

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  3. बहुत सुन्दर कविता
    (अरुन = arunsblog.in)

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  4. आभार आपका मेरे ब्लोग पर आपने अपने विचार दिये ..उसी से मैं आपके ब्लोग तक पहुंच सकी ....आपका लेखन बहुत सुंदर है ...बहुत अच्छा लगा आपके ब्लोग तक आकर ..

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  5. बहुत सुन्दर ऊर्जावान रचना ... गेयता लिए अनुपम रचना ...

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  6. झर रहा है फूल हरसिंगार का,
    कर रहा है मन तनिक श्रृंगार-सा!
    राह से गुजरा पथिक यह सोचता-
    "आह! यह सुरभित कहाँ डोला चला?"

    बहुत सुंदर भाव .... आभार मेरे ब्लॉग पर आने के लिए ....

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    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

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  7. अंतस्तल से निकली अभिव्यक्ति

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  8. बहुत गहरी अभिव्यक्ति!! वाह!!

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  9. बहुत ही सुन्दर रचना....:-)

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  10. Replies
    1. shukriya charcha me sthan dene ke liye ..meri purani posts bhi padhen aur apane vichar den

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  11. Behad khoobsoorti se harem bimb ka Pequot kiya Gaya hai.....bhavpoorn,arthpoorn aur sampoorn hai yah kavita,,,,chhayavad ke maharathiyon ki Yad aa gayi ise padh kar....abhibhoot Hun.

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  12. बहुत ही बेहतरीन भाव अभिव्यक्ति...
    :-)

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  13. वाह ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  14. ऊर्जावान रचना

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  15. झर रहा है फूल हरसिंगार का,
    कर रहा है मन तनिक श्रृंगार-सा!
    राह से गुजरा पथिक यह सोचता-
    "आह! यह सुरभित कहाँ डोला चला?"

    bahut khubsurat.. :):)

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